आस

मैं जब भी उठाता था कदम चलने को, ठिठक के रुक जाते थे यूँही |
न जाने कौन सी वो हवा थी, जो कहती थी धीरे से कानों में |
रुक जाओ ठहरो भी कहाँ जाते हो, ये गलियां नहीं जिंदगी हैं तुम्हारी |
इक अनसुनी ही सही पर दिलकश हैं कहानी तुम्हारी |
अजनबी सी वो दुनिया है तेरे वास्ते नयी |
बेरंग ही सही पर हैं ये चेहरे पहचाने से तेरे |
और मैं रुक जाता हूँ हर बार ये सोच के की कुछ तो असर होगा |
कभी तो इस दोआब का पानी कम होगा |
कुछ तो कमल फिर खिलेंगे इस दलदल में |
कभी तो फिर हो उठेंगे रंगी ये चेहरे फीके से |
टूटी सी हि सही कुछ आस तो है बाकी अभी |
इन आँखों को उस बदलाव की आस है अभी |

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