उम्मीद की किरण














झुकी पलकों के पीछे, बंद संदूक में ,
कंटीले बाड़ के पार, अंधियारी गुफा में,
क्या है छिपा, किसको पता,
कोशिश करो उन बंद पलकों की गहराइयों में,
जो है छुपा उसे समझने की .
खोलो उस संदूक को, टटोलो वो लम्हे,
कुछ खट्टे कुछ मीठे.
स्वप्न से सुन्दर, जल से निर्मल,
कुछ जाने-अनजाने से.
आवाज दो उस बाड़ के परे, उन गुफाओ की वीरानियो में ,
शायद कोई बैठा हो, सहमा हुआ,
घुप अंधियारे से डरा हुआ .
इक किरण के इंतज़ार में .

Comments

  1. उन गुफाओ की वीरानियो में ,
    शायद कोई बैठा हो, सहमा हुआ...

    बहुत गंभीर संकेत है. बढ़िया कविता. बधाई

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